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हाँ वही समय जो कभी मंदिर की पैड़ीयों
तो कभी सिनेमाघर की कॉर्नर सीटों पर बैठकर
तुम्हारे साथ गुज़ारा था,
मुझे उन पलों से भी प्रेम है
जिनमें हम भविष्य कि कल्पना करते थे, "तुम ऑफिस से रोज़ मुझे कॉल करोगे.. और आज जैसे हि, हम हमेशा रहेंगे..."
कुछ ऐसा हि कहती थी तुम,
पर कोई सपना मुकम्मल ना हुआ...
मुझे वो शाम से भी प्रेम है
जब ढलता सूरज, हम साथ में देखा करते थे,
उस पल में, खामोश ही जाती थी तुम,
वैसी हि ख़ामोशी आज भी है, पर प्रेम मुझे तुमसे नहीं उन क्षणों से है
जो मैं गुज़ार चुका...
हाँ सच में....
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