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काश हमारे नेताओ , युवाओ , चौधरियो व मुकददमो के भी कान में जूँ रेंगेती और वे भी कभी उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में किसी एक चौक का नाम अमर शहीद सन सत्तावन की क्रान्ति के जनक कोतवाल धन सिहँ गुर्जर जी के नाम पर रखवाते तो कितनी बढिया बात होती । या हम ही कोतवाल धन सिहँ गुर्जर को आज तक एक जाना पहचान टा नाम बना देते कि योगी जी शहीद भगत सिहँ व चन्द्रशेखर आजाद के साथ उनका भी नाम लेते। मगर लानत है समाज पर जो अपने वीर शहीदो को भी थोडा बहुत सम्मान ना दिला सका।
यूपी में योगी आद‍‍ित्यनाथ के सत्ता में आते ही प्रदेश में बड़े-बड़े बदलाव जारी हैं। इसी क्रम में सोमवार को राजधानी के कई चौराहों के नाम बदल द‍‍िए गए। लखनऊ के विधानसभा गेट नम्बर-7 का नाम बदलकर 'राजा विजय कुमार त्रिपाठी मार्ग' रख दिया गया है। -इसके अलावा गोमती नगर के मलिक टिम्बर का नाम बदलकर 'शहीद भगत सिंह चौक' रखा गया है।
-गोमती नगर के ही हुसड़िया चौराहे का नया नाम 'शहीद चंद्रशेखर चौक' होगा। -विधानसभा का नाम 'बाबा साहब अम्बेडकर मार्ग' से जाना जाएगा।
-जानकारी के अनुसार, यूपी सरकार ने लखनऊ में और कई चौराहों के नाम बदलने का निर्णय लिया है। अगर हम अब भी चाहे तो कोशिश कर सकते हैं कि लखनऊ में कोतवाल धन सिहँ गुर्जर के नाम का चौक हो व एक मूर्ति भी लगे। हमारे विधायको को इस दिशा में पहल की जरूरत है जो कि ये करेंगे नहीं ।
लखनऊ में भी एक रोड का नाम कोतवाल धन सिहँ गुर्जर मार्ग व सम्राट मिहिरभोज महान मार्ग हो जाये ।

सुन सको तो सुन लो
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महरौली से समीप फतेहपुर बेरी के तंवर गुर्जरों ने अपने नेता राव दरगाही तंवर गुर्जर के नेतृत्व में 1857 की क्रान्ति में बड़ा योगदान दिया था। जिसके फलस्वरूप अंग्रेंजों ने फतेहपुर बेरी के 12 वर्ष की आयु से उपर के सभी मर्द और औरतों को मौत के घाट उतार दिया गया था। 2 अक्टॅबर 1857 को ब्रिगेडियर जनरल शोवर्स के नेतृत्व में एक 15000 सैनिकों की विशाल सेना व तोपखाना तुगलकाबाद व महरौली क्षेत्र के गांव फतेहपुर बेरी गुडगांव रिवाड़ी व सोहना का दमन करने के लिए भेजी थी
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• 1857 के शहीद इन शहीदों को महरौली में फांसी दी गई थी :

1 छजिया नम्बरदार गुर्जर, कादरपुर 7 दिसम्बर 1857
2 गंगा नम्बरदार गुर्जर, रिठौज 7 दिसम्बर 1857
3 कलुआ वल्द तेजा गुर्जर, रिठौज 7 दिसम्बर 1857
4 शोभा गुर्जर, पाली 7 दिसम्बर 1857
5 मेहरा गुर्जर, पाली 7 दिसम्बर 1857
6 शौराब गुर्जर, पाली 7 दिसम्बर 1857
7 मीरा नम्बरदार गुर्जर, कादरपुर 7 दिसम्बर 1857
8 मेहराब गुर्जर, कादरपुर 7 दिसम्बर 1857
9 नन्दा गुर्जर, रिठौज 7 दिसम्बर 1857
10 भीखाराम वल्द बक्शीराम गुर्जर , दरबारीपुर 11 दिसम्बर 1857
11 बिरजा वल्द साधु राम गुर्जर, दरबारीपुर 11 दिसम्बर 1857
12 अमीर वल्द मुबारक गुर्जर, बेरका 6 जनवरी 1858
13 खुशहाल वल्द खाण्डूराम गुर्जर बेरका 6 जनवरी 1858
14 किशन एलियास खुशी वल्द चन्दू गुर्जर 6 जनवरी 1858

बेरका

15 रंगबाज वल्द मलखान गुर्जर, बेरका 6 जनवरी 1858
16 उदयचन्द गुर्जर, बेरका 6 जनवरी 1858
17 रतिया वल्द मुखा गुर्जर, बेरका 6 जनवरी 1858
18 कंवरचन्द गुर्जर, नगली 7 फरवरी 1858
19 रतनसिंह गुर्जर, नगली 7 फरवरी 1858
20 रतना गुर्जर, नगली 7 फरवरी 1858
21 रौला गुर्जर, नगली 7 फरवरी 1858
22 रूड़ा गुर्जर, नगली 7 फरवरी 1858
23 सहिया गुर्जर रिठौज को तोप से उड़ाया गया था ।
24 काला गुर्जर सहजावास को तोप से उड़ाया गया था।
25 अभय गुर्जर खोर को वृक्ष से लटका कर फांसी दी गई
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मेरठ बाइपास पर वहाँ के आसपास के गुर्जर गांवो को #कोतवाल_धन_सिहँ_गुर्जर की प्रतिमा लगवाने की मांग करना चाहिये ।युवाओ आगे आओ , अब नी करोगे तो कब करोगे ।शहर के चौक चौराहो पर तो कब्जा है दूसरो का।जो बचा है उस पर तुम कोशिश कर ना रहे तो फिर क्या फायदा हम फिर से निवेदन करते हैं कि एक दिन सब इकटठा होकर जाओ मेयर के पास व मांग रखो ।धरना दो वहाँ ।।
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रूडकी में सुनहरा गांव का बरगद शहीद स्मारक
यह सैकडो साल पुराना बरगद अंग्रेजो के जुल्म का खामोश गवाह है जहाँ अंग्रेजो ने कुंजा बहादुरपुर के विद्रोह 1824 में करीब डेढ सौ लोगो को पकडकर इस बरगद पर फांसी पर लटकाया था जिनमें कुंजा व रामपुर आदि गांव के लोग थे।
यहां से शुरू हुई थी आज़ादी की पहली क्रांति, वटवृक्ष पर क्रांतिकारियों को जिंदा लटकाया था।
बहुत कम लोगों को ये ज्ञान होगा कि देश की आज़ादी का सबसे पहला बिगुल रुड़की के एक गांव से बजा था। इस गांव का नाम है सुनहरा गांव। इसी गांव के वटवृक्ष पर 10 मई, 1857 को आज़ादी की पहली क्रांति का शुभारम्भ किया गया था। इस वटवृक्ष पर अंग्रेजों ने 150 से भी अधिक क्रांतिकारियों को जिंदा लटका दिया था तभी से इस स्थान को शहीद स्मारक नाम दिया गया।
10 मई, 1857 को आज़ादी की पहली क्रांति का हुआ था शुभारम्भ। तब भी यहाँ बहुत से क्रान्तिकारीयो को फांसी दी गयी। क्रांतिकारियों को दी जाती है श्रद्धांजली
इसलिए आज के दिन ( 10 मई क्रान्ति दिवस) हर वर्ष यहां सभी क्रांतिकारियों को श्रद्धांजली देने के लिए कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। अक्टूबर 1824 को हुआ था पहला युद्ध
गौर हो कि 10 मई, 1857 की क्रांति से कई वर्ष पहले 1824 को ही रुड़की में आजादी की क्रांति ज्वाला भड़क उठी थी। अक्टूबर 1824 को कुंजा ताल्लुका के राजा विजय सिंह गुर्जर व सेनापति कल्याण सिहँ के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ पहला युद्ध हुआ था। इसमें बड़ी संख्या में लोग शहीद हुए, कुछ पकड़े गए। इन लोगों को सुनहरा स्थित इस एतिहासिक वट वृक्ष पर फांसी दे दी गई थी। 3 अक्टूबर को हर साल राजा विजय सिहँ कुंजा शहीद दिवस मनाया जाता है। सैकड़ों ग्रामीणों को सरेआम दे दी गई थी फांसी
1857 की क्रांति के समय सहारनपुर से ज्वाइंट मजिस्ट्रेट सर राबर्टसन ने रामपुर, कुंजा आदि गांवों के लोगों को सरेआम इस पेड़ पर फांसी दे दी। उन्होंने यह कदम इसलिए उठाया कि लोग भयभीत हो जाए और अंग्रेजों के खिलाफ आवाज न उठा सके। देश आजाद होने तक पेड़ पर लटकी थीं जंजीरें
साल 1910 में शहर के एक लाला ललिता प्रसाद ने इस भूमि को खरीदा। ये गांव बाद में सुनहरा के नाम से जाना गया।
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कल ही हमने शहीद धनसिंह गुर्जर का स्टिकर पोस्ट किया और कल दी इन भाई ने अपनी बाईक पर छपवा भी लिया ।
घन्यवाद रमेश गुर्जर भालोट। 🙏 ----------------------------------------------------#uprising #freedomfighter #freedom #fighter #revolution #revolt #firstindependencewar #war #warrior #warriors #1857Revolt #british #fight #rebellion #uttarpradesh #meerut #dhansinghkotwal #mutiny #gujjar #gurjars #gujjars #mutineers #army #history #gurjar #historyofindia #battle #army #veergurjar #sacrifice

सूबा देव हंस कसाना गुर्जर (1857 के महानायक) :

देवहंस के पिता का नाम बीजासिंह गुर्जर था। इनका गांव कुदिन्ना राजस्थान के धौलपुर तथा बाड़ी के बीच तालाब शाही से 3 मील पूर्व की ओर धनी के बीच बसा हुआ है। यह कसाने गोत्र के गूर्जरों का गांव है। आगरा के सैयद से लेकर शिवपुरी के सवनवादा और नरवर तक तथा भिण्ड जिले के गुरीखा गांव से लेकर दतिया की तलहटी तक गूर्जराधार का इलाका कहलाता है। मुरैना जिले का पूर्व नाम तंवरधार और इससे लगा इलाका भदावर कहलाता है। इस प्रकार जिला मुरैना, ग्वालियर, भिण्ड, शिवपुरी, दतिया जिला (मध्य प्रदेश) के तमाम गांव जातीय बाहुल्यता के कारण गूर्जरधारा कहलाते हैं। प्रादेशिक सीमाएं (उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश) इन के सामाजिक संगठन और गुर्जर संस्कृति के मार्ग में बाधा नहीं है। देवहसं के गोत्र कसाना के सौगांव इस गूजरधार के अन्र्तगत आते हैं। कुदिन्ना गांव वर्तमान धौलपुर (राजस्थान) जिले के अन्र्तगत है। किन्तु इसका परिवेश उत्तर प्रदेश के आगरा, मध्य प्रदेश के मुरैना, ग्वालियर, शिवपुरी, भिण्ड, दतिया के गूजराधारा से निर्मित है। गूजराधार का क्षेत्र अधिकतर पहाड़ी, उबड़-खाबड़ तथा घने जंगलों से आच्छादित है। गूजरों का जब राजनैतिक पतन हुआ तो ये जंगलों, बीहड़ों में सिर छिपाने चले गये गये और अपनी खोई हुई शक्ति को बटोरने लगे लेकिन इन्होने सिर झुकाना पसन्द नहीं किया । पंद्रहवीं शताब्दी में यवनों के तूफानी आक्रमणों से इस क्षेत्र के गुर्जरों ने टक्कर ली थी छापामार युद्ध पद्धति गुर्जरों की खोज है जिसे कालान्तर में शिवाजी ने कुछ परिष्कृत करके निजामशाही आदिलशाही, मुगलशाही तथा कुतुबशाही से डटकर टक्कर ली थी और हिन्द स्वराज की स्थापना की थी । यही कुदिन्ना गांव मुगलिग हकूमत के दौरान लड़ाकू गुर्जरों का केन्द्र था। मुरैना के बमरौली, इटावली , टिक्होली, घुरैया बसई चैखेटी और मृगनयनी की गंाव रोराराई भी लड़ाकू गुर्जरों के केन्द्र थे । इन गांवों में कसाने, कोरी, तोमर, छावड़ी, घुरया, मावई व चन्देले गोत्र के गुर्जरों का प्रभुत्व तथा बाहुल्य है। (आगे का शेष कमेंट बोक्स मे पढे) #uprising #freedomfighter #freedom #fighter #revolution #revolt #hero #firstindependencewar #war #warrior #warriors #1857revolt #british #fight #rebellion #uttarpradesh #meerut #kranti #dhansinghkotwal #mutiny #gujjar #mutineers #army #history #gurjar #historyofindia #battle #army #veergurjar #sacrifice

#कुरु_केसरी_राव_कदम_सिहँ_नागर :
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सन सत्तावन की क्रान्ति कोतवाल धनसिहँ गुर्जर के द्वारा आरम्भ करते ही राष्ट्रवादी सैनिक व किसान समुदाय खासकर गुर्जर व मुसलमानो ने क्रान्ति में बढ चढकर हिस्सा लिया। यह क्रान्ति चर्च का घण्टा बजते ही मेरठ की कोतवाली से ठीक पाँच बजे शुरू हो गयी थी। इसके जनक क्रान्तिनायक धनसिहँ कोतवाल थे। वे मेरठ के कोतवाल थे। इस जनक्रान्ति के समय मेरठ के पूर्वी हिस्से यानी मवाना, गढ,किठौर,किला परिक्षितगढ,बहसूमा व हस्तिनापुर में गुर्जरो के नागर वंश का राज्य था। इसके अन्तिम राजा के केवल पुत्रियाँ होने के कारण यह भी अंग्रेजी साम्राज्य का अंग हो गया था। मगर इस वंश के लोगो पर जागीरे बची हुई थी।
वैसे इस वंश व क्रान्तिनायक धनसिहँ गुर्जर पर लेख फिर कभी लिखूँगा क्योंकि आज तो इस क्रान्ति के शुरू होने के महीने बाद जिस व्यक्ति ने मेरठ मण्डल में क्रान्तिकारियो का नेतृत्व किया था उन महान क्रान्तिकारी राव कदम सिहँ गुर्जर के बारे में लिखूँगा ।

राव कदम सिहँ हस्तिनापुर के अन्तिम राजा नैन सिहँ नागर के भाई के पोते थे। क्रान्ति शुरू होते ही मेरठ के पूर्वी हिस्से के लोगो ने अपना राजा घोषित कर दिया व इनके नेतृत्व में अंग्रेजो से लडाई शुरू कर दी। सबसे पहले इन्होने मवाना तहसील पर धावा डालकर उसे अपने कब्जे में लिया व हथियार लूट लिये। मवाना व उसके आसपास के लगभग पाँच हजार किसान जिनमें अधिकांश गुर्जर थे इनके साथ दिन रात सैनिको की तरह रहते थे। इनका गोरो से संघर्ष कई महीनो तक चलता रहा। बिजनौर के नवाब ने भी इनका भरपूर साथ दिया।
ये व इनके सब साथी सिर पर सफेद पगडी पहनते थे जिसे कफन के रूप में पहना जाता था। यह उन वीर क्रान्तिकारियो का आभूषण था।
महीनो तक अंग्रेजो से लडाई चली, कभी यहाँ कभी वहाँ मगर अंग्रेजो की विशाल सेना के सामने क्रान्ति की ज्वाला मंद पडती गयी। इस जनक्रान्ति को केवल कुछ वर्गो का ही साथ मिल पाया।
गंगा पार करके ये बिजनौर नवाब के पास चले गये जहाँ से क्रानितकारी गतिविधियाँ चलती रही।
सन 1858 में अप्रैल महीने में अंग्रेजो ने इन्हें गिरफ्तार कर लिया व गुपचुप फाँसी दे दी। सभी किताबो में इनके बारे में पढाया जाता है खासकर मेरठ से प्रकाशित पुस्तको में
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शिब्बा सिंह गुर्जर - क्रान्तिवीर (1857) :

मेरठ से 13 मील दूर, दिल्ली जाने वाले राज मार्ग पर मोदीनगर से सटा हुआ एक गुमनाम गाँव है-सीकरी खुर्द। 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम में इस गाँव ने एक अत्यन्त सक्रिय भूमिका अदा की थी1। 10 मई 1857 को देशी सैनिक ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सरकार के विरूद्ध संघर्ष की शुरूआत कर दिल्ली कूच कर गये थे। जब मेरठ के क्रान्तिकारी सैनिक मौहिउद्दीनपुर होते हुए बेगमाबाद (वर्तमान मोदीनगर) पहुंचे तो सीकरी खुर्द के लोगों ने इनका भारी स्वागत-सत्कार किया। इस गाँव के करीब 750 गुर्जर नौजवान की टोली में शामिल हो गये और दिल्ली रवाना हो गये। अगले ही दिन इस जत्थे की दिल्ली के तत्कालीन खूनी दरवाजे पर अंग्रेजी फौज से मुठभेड़ हो गई जिसमें अनेक नौजवान गुर्जर क्रान्तिकारी शहीद हो गए। 1857 के इस स्वतन्त्रता समर के प्रति अपने उत्साह और समर्पण के कारण सीकरी खुर्द क्रान्तिकारियों का एक महत्वपूर्ण ठिकाना बन गया। गाँव के बीचोबीच स्थित एक किलेनुमा मिट्टी की दोमंजिला हवेली को क्रान्तिकारियों ने तहसील का स्वरूप प्रदान किया। यह हवेली सिब्बा सिंह गुर्जर की थी जो सम्भवतः क्रान्तिकारियों का नेता था। आसपास के अनेक गाँवों के क्रान्तिकारी सीकरी खुर्द में इकट्ठा होने लगे। मेरठ के कुछ क्रान्तिकारी सैनिक भी इनके साथ थे। इस कारण यह दोमंजिला हवेली क्रान्तिकारी गतिविधियों का केन्द्र बन गयी। उस समय सीकरी खुर्द, लालकुर्ती मेरठ में रहने वाले बूचड़वालों की जमींदारी में आता था। लालकुर्ती के जमींदार ने स्वयं जाकर सिब्बा मुकद्दम से बातचीत की। उसने सिब्बा को, अंग्रेजों के पक्ष में करने के लिए, लालच देते हुए कहा कि-”मुकद्दम जितने इलाके की ओर तुम उँगली उठाओगे, मैं वो तुम्हे दे दूँगा तथा जो जमीन तुम्हारे पास है उसका लगान भी माफ कर दिया जायेगा। लेकिन सिब्बा ने जमींदार की बात नहीं मानी।अब सीकरी खुर्द के गुर्जर खुलेआम अंग्रेजों के विरूद्ध हो गये।
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बासौद की कुर्बानी ( Basodh ki Kurbani )

डा. सुशील भाटी

मेरठ के कोतवाल चौ धनसिंह गुर्जर ने सन् 57 की क्रान्ति की पहली मशाल जलाई जिसकी चिंगारी चारो तरफ फैल चुकी थी। सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में बाबा शाहमल सिंह कीभूमिका अग्रणी क्रान्तिकारी नेता की थी। तत्कालीन मेरठ के बागपत-बड़ौत क्षेत्र में बगावत का झण्डा बुलन्द कर, शाहमलसिंह ने दिल्ली के क्रान्तिकारियों को रसद आदि पहुचाना शुरुकर दिया था। मेरठ के अंग्रेजी प्रशासन एवं दिल्ली में अंग्रेजी फौज के सम्पर्क को तोड़ने के लिए बागपत क्षेत्र के गूजरों ने, शाहमल सिंह के निर्देश पर, बागपत का यमुना पुल तोड़ने दिया।क्रांन्ति में बाबा शाहमल के इस योगदान से प्रसन्न होकर, मुगलबादशाह बहादुरशाह जफर ने शाहमल सिंह को बागपत-बड़ौतपरगने का नायब सूबेदार बना दिया।
यूं तो बागपत-बड़ौत क्षेत्र के 28 गांवों ने क्रान्ति मेंसक्रिय सहयोग किया था, और प्रति क्रान्ति के दौर में उन्होंनेअंग्रेजों के असहनीय जुल्मों और अत्याचारों को झेला था, परन्तुइनमें मेरठ बागपत रोड के समीप स्थित बासौद एक ऐसा गांव था जिसने अपनी देशभक्ति की सबसे बड़ी कीमत अदा की थी।इस गांव के लगभग 150 लोगों को मारने के बाद अंग्रेजों ने गांव को आग लगा दी थी।
बाबा शाहमल ने जब बड़ौत पर हमला किया था तोवो तहसील के खजाने को नहीं लूट पाए क्योंकि बड़ौत का तहसीलदार करम अली इसे डौला गांव के जमींदार नवल सिंह की मदद से सुरक्षित स्थान पर ले गया। कलैक्टर डनलप ने मेजरजनरल हैविट को लिखे पत्र में नवल सिंह की गणना अंगे्रजों केप्रमुख मददगार के रूप में की थी। इस बात से बेहद खफा होकर,बाबा शाहमल ने नवल सिंह आदि को सजा देने के लिए डौला केपड़ौसी गांव बासौद में, अपने लाव-लश्कर के साथ, डेरा डालदिया। बासौद गांव के लोगों ने आरम्भ से ही क्रन्तिकारी गतिविधियों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था। उस दिन भी वहां दिल्ली से दो गाजी आए हुए थे, और दिल्ली के क्रांन्तिकारियों को रसद पहुंचाने के लिए 8000 मन अनाज एवं दाल क्षेत्र सेइकट्ठा की गई थी।
बागपत क्षेत्र में क्रान्ति का दमन करने के लिए, उसीदिन डनलप के नेतृत्व में खाकी रिसाला भी दुल्हैणा पहुंच गया।दुलहैणा डौला से लगभग सात मील दूर है। खाकी रिसाले मंेलगभग 200 सिपाही थे। रिसाले में 2 तोपें, 8 गोलन्दाज
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🙏🏽🙏🏽 गाजियाबाद के मेयर आशू वर्मा जी के इस कदम का बहुत बहुत स्वागत व सराहना करनी चाहिये आखिर वर्मा जी ने आगे बढकर देश की आजादी के लिये शहीद हुए क्रान्तिवीरो की याद में हरनंदी यानी हिंडन नदी के तट पर करेहडा गांव में नगर निगम की 12000 वर्गमीटर जमीन पर शहीद स्मारक की घोषणा की है। साथ ही यहाँ दादरी के राजा राव उमराव सिहँ भाटी की विशाल प्रतिमा की घोषणा की है। काश आशू वर्मा जी से सबक लेकर परिक्षितगढ का चेयरमैन भी राव कदम सिहँ गुर्जर का स्मारक बनवाये व मेरठ के मेयर महोदय गगोल गांव में दादावीर झंडू सिहँ नंबरदार के लिये कुछ करें। मोदीनगर का विधायक या चेयरमैन सीकरी के  अमर सेनानी मुकददम शिब्बा सिहँ गुर्जर का स्मारक बनवायें। साथ ही उम्मीद करते हैं कि वर्मा जी की इस अनुकरणीय पहल को देखकर दादरी में राव उमराव सिहँ भाटी की एक आदमकद प्रतिमा लगेगी व काँलिज व पार्क का नामकरण उनके नाम पर होगा । साथ ही कोई सरकारी पहल भी होगी। महापौर आशु वर्मा जी आपके इस कदम को लिये हम सभी आपके आभारी रहेंगे व आपको बहुत बहुत साधुवाद ।। 30 मई 1857 ई० में राजा राव उमराव सिहँ भाटी के नेतृत्व में हिंडन का ऐतिहासिक युद्ध हुआ था जिसमें राव उमराव सिहँ भाटी व अंग्रेजो के बीच दो दिन तक घमासान युद्ध चला व अंग्रेजो को पीछे हटना पडा। राव उमराव सिहँ भाटी के साथ उनके चाचा राव रोशन सिहँ भाटी व उनका चचेरा भाई राव बिशन सिहँ भाटी ,राव उमराव सिहँ भाटी के जिगरी दोस्त मालागढ के नवाब वलीदाद खाँ व  मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर का लडका शहजादा मिर्जा अबू बक्र ने इस ऐतिहासिक युद्ध में साथ दिया व राजा राव उमराव सिहँ के नेतृत्व में यह भीषण संग्राम हुआ जिसमें उस समय की दुनिया सबसे प्रशिक्षित अंग्रेजी सेना को करारी हार का सामना करना पडा। यह युद्ध हिंडन का युद्ध कहा जाता है। हिंडन युद्ध की पूरी कहानी आप परसो कि गई पोस्ट मे पढ सकते है - The War of Hindon
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#दिल्ली_के_वीर_शहीदो_को_नमन 🙏🏽
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दयाराम गुर्जर चन्द्रावल गांव का रहने वाला था। चन्द्रावल गांव दिल्ली शहर के बिल्कुल समीप है जो कमलानगर से मिला हुआ है। 1857 ई0 क्रान्ति मे दिल्ली के आसपास के गुर्जर अपनी ऐतिहासिक परम्परा के अनुसार विदेशी हकूमत से टकराने के लिये उतावले हो गये थे । दिल्ली के चारों ओर बसे हुए तंवर, चपराने, कसाने, बैंसले, विधुड़ी, अवाने खारी, बासटटे, लोहमोड़, बैसाख तथा डेढ़िये वंशों के गुर्जर संगठित होकर अंग्रेंजी हकूमत को भारत से खदेड़ा और दिल्ली के मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर को पुनः भारत का सम्राट बनाने के लिए प्राणपण से जुट गये थे । गुर्जरों ने शेरशाहपुरी मार्ग मथुरा रोड़ यमुना नदी के दोनों किनारों के साथ-2 अधिकार करके अंग्रेंजी सरकार के डाक, तार तथा संचार साधन काट कर कुछ समय के लिए दिल्ली अंग्रेंजी राज समाप्त कर दिया था। दिल्ली के गुर्जरों ने मालगुजारी बहादुरशाह जफर मुगल बादशाह को देनी शुरू कर दी थी ।
दयाराम गुर्जर के नेतृत्व में गुर्जरों ने दिल्लीी के मेटकाफ हाउस को कब्जे में ले लिया । जो अंग्रेंजों का निवास स्थान था, यहंा पर सैनिक व सिविलियम उच्च अधिकारी अपने परिवारों सहित रहा करते थे । जैसे ही क्रान्ति की लहर मेरठ से दिल्ली पहुंची, दिल्ली के गुर्जरों में भी वह जंगल की आग की तरफ फैल गई । दिल्ली के मेटकाफ हाउस में जो अंग्रेंज बच्चे और महिलायें उनको जीवनदान देकर गुर्जरों ने अपनी उच्च परम्परा का परिचय दिया था। महिलाओं और बच्चों को मारना पाप समझ कर उन्होने जीवित छोड़ दिया था और मेटकाफ हाउस पर अधिकार कर लिया ।दयाराम गुर्जर के नेतृत्व में दिल्ली के समीप वजीराबाद जो अंग्रेंजों का गोला बारूद का जखीरा था उस पर अधिकार करके बहादुरशाह जफर के हवाले कर दिया जिसमें एक लाख रू0 की बन्दूके थी। इसी तरह अंग्रेंजी सेना की 16 गाड़ियां 7 जून 1857 को रास्ते में जाती हुई रोक कर उनको अपने कब्जे में लेकर मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर को लाल किले में जा कर भेंट कर दी थी
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10 मई 1857 को मेरठ में क्रान्ति के विस्फोट के बाद मेरठ के आस-पास स्थित गुर्जरो के गांवों ने अंग्रेजी राज की धज्जिया उड़ा दी। अंग्रेजों ने सबसे पहले उन गांवों को सजा देने पर विचार किया जिन्होंने 10 मई की रात को मेरठ में क्रान्ति में बढ़ चढ़कर भाग लिया था और उसके बाद मेरठ के बाहर जाने वाले आगरा, दिल्ली आदि मार्गो को पूरी तरह से रेाक दिया था। जिसकी वजह से मेरठ का सम्पर्क अन्य केन्द्रों से कट गया था। इस क्रम में सबसे पहले 24 मई को 'इख्तयारपुर' पर और उसके तुरन्त बाद 3 जून को 'लिसाड़ी' , 'नूर नगर' और 'गगोल गांव' पर अंग्रेजों ने हमला किया। ये तीनों गांव मेरठ के दक्षिण में स्थित 3 से 6 मील की दूरी पर स्थित थे। लिसारी और नूरनगर तो अब मेरठ महानगर का हिस्सा बन गए हैं। गगोल प्राचीन काल में श्रषि विष्वामित्र की तप स्थली रहा है और इसका पौराणिक महत्व है। नूरनगर, लिसाड़ी और गगोल के किसान उन क्रान्तिवीरों में से थे जो 10 मई 1857 की रात को घाट, पांचली, नंगला आदि के किसानों के साथ कोतवाल धनसिंह गुर्जर के बुलावे पर मेरठ पहुँचे थे। अंग्रेजी दस्तावेजों से यह साबित हो गया है कि धनसिंह कोतवाल के नेतृत्व में सदर कोतवाली की पुलिस और इन किसनों ने क्रान्तिकारी घटनाओं का अंजाम दिया था। इन किसानों ने कैण्ट और सदर में भारी तबाही मचाने के बाद रात 2 बजे मेरठ की नई जेल तोड़ कर 839 कैदियों को रिहा कर दिया। 10 मई 1857 को सैनिक विद्रोह के साथ-साथ हुए इस आम जनता के विद्रोह से अंग्रेज ऐसे हतप्रभ रह गए कि उन्होंने अपने आप को मेरठ स्थित दमदमें में बन्द कर लिया। वह यह तक न जान सके विद्रोही सैनिक किस ओर गए हैं ?  इस घटना के बाद नूरनगर, लिसाड़ी, और गगोल के क्रान्तिकारियों बुलन्दशहर आगरा रोड़ को रोक दिया और डाक व्यवस्था भंग कर दी। आगरा उस समय उत्तरपश्चिम प्रांत की राजधानी थी। अंग्रेज आगरा से सम्पर्क टूट जाने से बहुत परेषान हुए। गगोल आदि गाँवों के इन क्रान्तिकारियों का नेतृत्व गगोल के झण्डा सिंह गुर्जर उर्फ झण्डू दादा कर रहे थे। उनके नेतृत्व में क्रान्तिकारियों ने बिजली बम्बे के पास अंग्रेज़ी सेना के एक कैम्प को ध्वस्त कर दिया था। आखिरकार 3 जून को
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महरौली से समीप फतेहपुर बेरी के तंवर गुर्जरों ने अपने नेता राव दरगाही तंवर गुर्जर के नेतृत्व में 1857 की क्रान्ति में बड़ा योगदान दिया था। जिसके फलस्वरूप अंग्रेंजों ने फतेहपुर बेरी के 12 वर्ष की आयु से उपर के सभी मर्द और औरतों को मौत के घाट उतार दिया गया था। 2 अक्टॅबर 1857 को ब्रिगेडियर जनरल शोवर्स के नेतृत्व में एक 15000 सैनिकों की विशाल सेना व तोपखाना तुगलकाबाद व महरौली क्षेत्र के गांव फतेहपुर बेरी गुडगांव रिवाड़ी व सोहना का दमन करने के लिए भेजी थी
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• 1857 के शहीद इन शहीदों को महरौली में फांसी दी गई थी :

1 छजिया नम्बरदार गुर्जर, कादरपुर 7 दिसम्बर 1857
2 गंगा नम्बरदार गुर्जर, रिठौज 7 दिसम्बर 1857
3 कलुआ वल्द तेजा गुर्जर, रिठौज 7 दिसम्बर 1857
4 शोभा गुर्जर, पाली 7 दिसम्बर 1857
5 मेहरा गुर्जर, पाली 7 दिसम्बर 1857
6 शौराब गुर्जर, पाली 7 दिसम्बर 1857
7 मीरा नम्बरदार गुर्जर, कादरपुर 7 दिसम्बर 1857
8 मेहराब गुर्जर, कादरपुर 7 दिसम्बर 1857
9 नन्दा गुर्जर, रिठौज 7 दिसम्बर 1857
10 भीखाराम वल्द बक्शीराम गुर्जर , दरबारीपुर 11 दिसम्बर 1857
11 बिरजा वल्द साधु राम गुर्जर, दरबारीपुर 11 दिसम्बर 1857
12 अमीर वल्द मुबारक गुर्जर, बेरका 6 जनवरी 1858
13 खुशहाल वल्द खाण्डूराम गुर्जर बेरका 6 जनवरी 1858
14 किशन एलियास खुशी वल्द चन्दू गुर्जर 6 जनवरी 1858

बेरका

15 रंगबाज वल्द मलखान गुर्जर, बेरका 6 जनवरी 1858
16 उदयचन्द गुर्जर, बेरका 6 जनवरी 1858
17 रतिया वल्द मुखा गुर्जर, बेरका 6 जनवरी 1858
18 कंवरचन्द गुर्जर, नगली 7 फरवरी 1858
19 रतनसिंह गुर्जर, नगली 7 फरवरी 1858
20 रतना गुर्जर, नगली 7 फरवरी 1858
21 रौला गुर्जर, नगली 7 फरवरी 1858
22 रूड़ा गुर्जर, नगली 7 फरवरी 1858
23 सहिया गुर्जर रिठौज को तोप से उड़ाया गया था ।
24 काला गुर्जर सहजावास को तोप से उड़ाया गया था।
25 अभय गुर्जर खोर को वृक्ष से लटका कर फांसी दी गई
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10 मई , क्रान्ति दिवस पर विशेष:

क्रान्तिनायक कोतवाल धनसिहँ गुर्जर ( चपराणा)
# शहीद चौधरी हिम्मत सिहँ खटाणा #
चौधरी हिम्मत सिंह खटाणा वंश के गुर्जर थे । इनका गांव रिठौज गुडगांव जिले में आबाद है। हिम्मत सिंह ने 1857 की क्रान्ति में अन्य गुर्जरों के साथ बढ़ चढ़ कर भाग लिया था। 13 मई 1857 के दिन सिलानी गांव में गुर्जरों और अंग्रेंजी फौज की डट कर टक्कर हुई थी। गुर्जरों का नेता चौ0 हिम्मत सिंह खटाणा था और अंग्रेंज सेनापति विलियम फोर्ड था। गुर्जरों को खटाणे व भौैंसले तथा इनके समीपस्थ रहने वाले मेव भी थे ।
विलियम फोर्ड क्रान्तिकारी गांवों के दमन चक्र के लिए ही निकला था, मोहम्मदपुर, नरसिंह पुर, बेगमपुर, खटोला, दरबारी हसनपुर, रामगढ़ तंवर भोआपुर नया गांव, कादरपुर तिगरा उल्हावास, बहरमपुर, घाटा, बालियाबाद, बन्धवाड़ी, गुआलपहाड़ी, नाथूपुर, अहिया नगर, घिटरौनी, फतेहपुर बेरी आदि गांवों के तंवर, हरषाणें, भाटी, लोहमोड़, घोड़ा रोप, बोकन, खटाने, भौंसले आदि गोत्र के गुर्जरों ने विलियम फोर्ड का 300 सैनिक दस्ती पर जो हथियारों से लैस था अपना दुश्मन समझ कर सिलानी के पास जोरदार हमला कर दिया था। इस लड़ाई में अनेक अंग्रेंज मारे गए थे । बहुत से बन्दी बना लिए गए । अंग्रेंजों से बैलों की दांय चलवाई । 784000रू0 लड़ाई में गुर्जरों के हाथ लगा । गुर्जरों का नेता हिम्मत सिंह खटाणा इस लड़ाई में शहीद हुआ । हिम्मत सिंह खटाणा बहादुर देश भक्त तथा स्वाधीनता प्रिय गुर्जर था विदेशी फौज से लड़ता हुआ शहीद हुआ था। सारे इलाके में इनके निधन पर शोक छा गया था। रिठौज गांव के बड़े ताल के पास इनका स्मारक बनाया गया । जिसे छतरी कहते हैं। दिवाली के दिन यहंा हर वर्ष मेला लगता है। किसी कवि का वचन है:-
शहीदों की चिताओं पर, जुड़ेंगें हर वर्ष मेले ।
वतन पर मरने वालों का बाकी यही निशां होगा ।
शहीद भजन सिंह गुर्जर
भजन सिंह गुर्जर गुडगांव जिले के बहलपा गांव का निवासी था। उसका गोत्र खटाणा था । वह भजन गुर्जर के नाम से मशहूर था। स्थानीय लोग उसे डाफा भी कहते थे । उसने 1857 ई0 की क्रान्ति में खटाणा खाप के गुर्जरों का नेतृत्व किया था। 1857 की क्रान्ति के दमन स्वरूप जब खटाणे गुर्जरों को जो रिठौज,सहजावास , बहलपा, खेलड़ा तथा बेरका गांव के
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बासौद की कुर्बानी ( Basodh ki Kurbani )

डा. सुशील भाटी

मेरठ के कोतवाल चौ धनसिंह गुर्जर ने सन् 57 की क्रान्ति की पहली मशाल जलाई जिसकी चिंगारी चारो तरफ फैल चुकी थी। सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में बाबा शाहमल सिंह कीभूमिका अग्रणी क्रान्तिकारी नेता की थी। तत्कालीन मेरठ के बागपत-बड़ौत क्षेत्र में बगावत का झण्डा बुलन्द कर, शाहमलसिंह ने दिल्ली के क्रान्तिकारियों को रसद आदि पहुचाना शुरुकर दिया था। मेरठ के अंग्रेजी प्रशासन एवं दिल्ली में अंग्रेजी फौज के सम्पर्क को तोड़ने के लिए बागपत क्षेत्र के गूजरों ने, शाहमल सिंह के निर्देश पर, बागपत का यमुना पुल तोड़ने दिया।क्रांन्ति में बाबा शाहमल के इस योगदान से प्रसन्न होकर, मुगलबादशाह बहादुरशाह जफर ने शाहमल सिंह को बागपत-बड़ौतपरगने का नायब सूबेदार बना दिया।
यूं तो बागपत-बड़ौत क्षेत्र के 28 गांवों ने क्रान्ति मेंसक्रिय सहयोग किया था, और प्रति क्रान्ति के दौर में उन्होंनेअंग्रेजों के असहनीय जुल्मों और अत्याचारों को झेला था, परन्तुइनमें मेरठ बागपत रोड के समीप स्थित बासौद एक ऐसा गांव था जिसने अपनी देशभक्ति की सबसे बड़ी कीमत अदा की थी।इस गांव के लगभग 150 लोगों को मारने के बाद अंग्रेजों ने गांव को आग लगा दी थी।
बाबा शाहमल ने जब बड़ौत पर हमला किया था तोवो तहसील के खजाने को नहीं लूट पाए क्योंकि बड़ौत का तहसीलदार करम अली इसे डौला गांव के जमींदार नवल सिंह की मदद से सुरक्षित स्थान पर ले गया। कलैक्टर डनलप ने मेजरजनरल हैविट को लिखे पत्र में नवल सिंह की गणना अंगे्रजों केप्रमुख मददगार के रूप में की थी। इस बात से बेहद खफा होकर,बाबा शाहमल ने नवल सिंह आदि को सजा देने के लिए डौला केपड़ौसी गांव बासौद में, अपने लाव-लश्कर के साथ, डेरा डालदिया। बासौद गांव के लोगों ने आरम्भ से ही क्रन्तिकारी गतिविधियों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था। उस दिन भी वहां दिल्ली से दो गाजी आए हुए थे, और दिल्ली के क्रांन्तिकारियों को रसद पहुंचाने के लिए 8000 मन अनाज एवं दाल क्षेत्र सेइकट्ठा की गई थी।
बागपत क्षेत्र में क्रान्ति का दमन करने के लिए, उसीदिन डनलप के नेतृत्व में खाकी रिसाला भी दुल्हैणा पहुंच गया।दुलहैणा डौला से लगभग सात मील दूर है। खाकी रिसाले मंेलगभग 200 सिपाही थे। रिसाले में 2 तोपें, 8 गोलन्दाज
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हिंडन का युद्ध - The war of Hindan :
(✍🏼Dr. Sushil Bhati)
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1857 के स्वतन्त्रता संग्राम में मेरठ और दिल्ली की सीमा परहिंडन नदी के किनारे 30, 31 मई 1857 को राष्ट्रवादी सेना और अंग्रेजों के बीच एक ऐतिहासिक युद्ध हुआ था जिसमें भारतीयों ने मुगल शहजादा मिर्जा अबू बक्र,[1] दादरी के राजाउमराव सिंह गुर्जर[2] और मालागढ़ के नबाब वलीदाद खाँन[3] केनेतृत्व में अंग्रेजी सेना के दांत खट्टे कर दिये थे।जैसा कि विदित है कि 10 मई 1857 को मेरठ में कोतवाल धनसिंह गुर्जर के नेतृत्वम् विद्रोह हुआऔर रात में ही वो दिल्ली कूच करगए थे। 11 मई को इन्होंने अन्तिम मुगल बादशाह बहादुर शाहजफर को हिन्दुस्तान का बादशाह घोषित कर दिया[4] औरअंग्रेजों को दिल्ली के बाहर खदेड़ दिया। अंग्रेजों ने दिल्ली केबाहर रिज क्षेत्र में शरण ले ली।तत्कालीन परिस्थितियों में दिल्ली की क्रान्तिकारी सरकार के लिए मेरठ क्षेत्र बहुत महत्वपूर्ण था। न केवल मेरठ से गुर्जर विद्रोह की शुरूआत हुई थी वरन पूरे मेरठ क्षेत्र में, सहारनपुर से लेकर बुलन्दशहर तक का हिन्दू-मुस्लिम, किसान-मजदूर सभीआमजन, इस अंग्रेज विरोधी संघर्ष में कूद पड़े थे। ब्रिटिशविरोधी संघर्ष ने यहाँ जन आन्दोलन और जनक्रान्ति का रूपधारण कर लिया था। मेरठ क्षेत्र दिल्ली के क्रान्तिकारियों कोजन, धन एवं अनाज (रसद) की भारी मदद पहुँच रहा था। स्थितिको देखते हुए मुगल बादशाह ने मालागढ़ के नवाब वलीदाद खानको इस क्षेत्र का नायब सूबेदार बना दिया,[5] उसने इस क्षेत्र की क्रान्तिकारी गतिविधियों को गति प्रदान करने के लिये दादरी में क्रान्तिकारियों के नेता राजा उमराव सिंह भाटी से सम्पर्क साधा[6], जिसने दिल्ली की क्रान्तिकारी सरकार का पूरा साथ देने का वादा किया।मेरठ में अंग्रेजों के बीच अफवाह थी कि विद्रोही सैनिक, बड़ी भारी संख्या में, मेरठ पर हमला कर सकते हैं।[7] अंग्रेज मेरठ को बचाने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ थे क्योंकि मेरठ पूरे डिवीजन का केन्द्र था। मेरठ को आधार बनाकर ही अंग्रेज इस क्षेत्र में क्रान्ति का दमन कर सकते थे। अंग्रेज इस सम्भावित हमले से रक्षा
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#मेरठ_के_क्रान्तिकारियों_का_सरताज_राव_कदम_सिंह_नागर
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1857 ई0 के स्वतंत्रता संग्राम मे राव कदम सिंह मेरठ के पूर्वी क्षेत्र में क्रान्तिकारियों का नेता था। उसके साथ 10,000 हजार क्रान्तिकारी थे, जो कि प्रमुख रूप से मवाना, हिस्तानपुर और बहसूमा क्षेत्र के थे। ये क्रान्तिकारी कफन के प्रतीक के तौर पर सिर पर सफेद पगड़ी बांध कर चलते थे। मेरठ के तत्कालीन कलक्टर आर0 एच0 डनलप द्वारा मेजर जनरल हैविट को 28 जून 1857 को लिखे पत्र से पता चलता है कि क्रान्तिकारियों ने पूरे जिले में खुलकर विद्रोह कर दिया और परीक्षतगढ़ के राव कदम सिंह को पूर्वी परगने का राजा घोषित कर दिया। राव कदम सिंह और दलेल सिंह के नेतृत्व में क्रान्तिकारियों ने परीक्षतगढ़ की पुलिस पर हमला बोल दिया और उसे मेरठ तक खदेड दिया। उसके बाद, अंग्रेजो से सम्भावित युद्व की तैयारी में परीक्षतगढ़ के किले पर तीन तोपे चढ़ा दी। ये तोपे तब से किले में ही दबी पडी थी जब सन् 1803 में अंग्रेजो ने दोआब में अपनी सत्ता जमाई थी। इसके बाद हिम्मतपुर ओर बुकलाना के क्रान्तिकारियों ने राव कदम सिंह के नेतृत्व में गठित क्रान्तिकारी सरकार की स्थापना के लिए अंग्रेज परस्त गाॅवों पर हमला बोल दिया और बहुत से गद्दारों को मौत के घाट उतार दिया। क्रान्तिकारियों ने इन गांव से जबरन लगान वसूला। राव कदम सिंह बहसूमा परीक्षतगढ़ रियासत के अंतिम राजा नैन सिंह के भाई का पौत्र था। राजा नैन सिंह के समय रियासत में 349 गांव थे और इसका क्षेत्रफल लगभग 800 वर्ग मील था। 1818 में नैन सिंह के मृत्यू के बाद अंग्रेजो ने रियासत पर कब्जा कर लिया था। इस क्षेत्र के लोग पुनः अपना राज चाहते थे, इसलिए क्रान्तिकारियों ने कदम सिंह को अपना राजा घोषित कर दिया। 10 मई 1857 को मेरठ में हुए गुर्जर विद्रोह की खबर फैलते ही मेरठ के पूर्वी क्षेत्र में क्रान्तिकारियों ने राव कदम सिंह के निर्देश पर सभी सड़के रोक दी और अंग्रेजों के यातायात और संचार को ठप कर दिया। मार्ग से निकलने वाले सभी यूरोपियनो  को लूट लिया। मवाना-हस्तिनापुर के क्रान्तिकारियों ने राव कदम सिंह के भाई दलेल सिंह,
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दिल्ली के गुर्जर पार्षदो की यह जिम्मेदारी है कि वे दिल्ली में हर महत्वपूर्ण नामी गिरामी आदमी के नाम पर रखे गये रोड के नाम की तरह कोतवाल धन सिहँ गुर्जर मार्ग रखवायें । दिल्ली में एक बडे पार्क का नामकरण भी क्रान्ति के जनक कोतवाल धन सिहँ के नाम पर हों । साथ ही किसी बडे चौक पर उनकी प्रतिमा लगें। यह काम हमें हर हाल में कराना चाहिये ।। सोकर पडे रहने की बजाय आँखे खोलकर आगे बढकर अपने शहीदो को सम्मान दिलाना होगा ।।
जहाँ हम करा सकते हैं कम से कम वहाँ तो करायें।।
ये जो बीस पच्चीस पार्षद हैं ये आचार डालने के लिये नहीं है या सफेद कुर्ता पहनकर हम पर ही रौब झाडने तो बल्कि बिरादरी के लिये व देश की वीर सपूतो के लिये भी कुछ जिम्मेदारी बनती है ।।
या तो ये काम करो नहीं तो बिरादरी के बहिस्कार के लिये तैयार रहो।।
इन पार्षदो के कानो तक यह बात इन पार्षदो के करीबी , रिश्तेदार , पडोसी व गांव वालो को पहुँचाना होगा।
जय कोतवाल, जय हिंद
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शेरे-गदर कोतवाल धन सिहँ गुर्जर
चाहे बगदाद के हों खलीफा , या हो यूरोप के गोरे
बनकर प्रतिहार देश के , खूब लडे गूजरन के छोरे ।।
इक्कीसवी सदी में कोतवाल धन सिहँ गुर्जर का नाम देश के हर कोने में पहुँचाना हमारा काम है क्योंकि यहाँ आजकल के वजीर गद्दार थे तब के। यह हमारा काम है कि हम शेर ए गदर कोतवाल धन सिहँ गुर्जर को घर घर पहचान दिलाये। हम कर सकते हैं यह क्योंकि हमने कुर्बानी दी है ,हमने बागी होकर गोरो का कोपभाजन झेला है। हमने बीहडो में शरण ली, हमने सुख सुविधाये त्यागी ,हम हुए बागी। हमने सत्ता का चाटुकार बनना मंजूर नहीं किया हमने स्वाभिमान से लडना व मरना स्वीकार किया। हमने अंग्रेजो की तोपो के आगे गाँव के गाँव जलवा दिये मगर हमने जुल्म व ज्यादती के खिलाफ विद्रोही होना स्वीकार किया। आज मैं गुर्जरो के बच्चे बच्चे से अपील करता हूँ कि अपनी फेसबुक से लेकर वाटसएप प्रोफाइल पर कोतवाल धन सिहँ गुर्जर का यह चित्र लगाओ। क्योंकि हम आज लगायेंगे तोसकल को दूसरे भी लगायेंगे । शहीद भगत सिहँ,आजाद ,बिस्मिल ,नेता जी ,रानी लक्ष्मीबाई, वीर शिवाजी की तरह देश में कोतवाल धन सिहँ गुर्जर जी का भी बराबर सम्मान होना चाहिये ।। याद रखो कद बढाने से बढते हैं, अगर आज ये कदम नहीं उठाओगे तो ये नाम सदा ही गुमनामी की चादर ओढकर खामोश ही रहेंगे।
ले लो ,ले लो के नारे गुर्जरो ने अंग्रेजो के खिलाफ दिया था । सो आज फिर से यह बात दोहराओ व जोर लगा दो दस मई क्रान्ति दिवस तक कोतवाल जी की पहचान व सम्मान के लिये ।।
जय हिंद,जय कोतवाल
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1824 की क्रान्ति जिसे इतिहास ने भूला दिया - 1981 की क्रान्ति फिल्म इस गुर्जर विद्रोह पर आधारित थी
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1757 ई0 में प्लासी के युद्व के फलस्वरूप भारत में अग्रेंजी राज्य की स्थापना के साथ ही भारत में उसका विरोध प्रारम्भ हो गया, और 1857 की क्रान्ति तक भारत में अनेक संघर्ष हुए, जिस प्रकार 10 मई सन् 1857 में क्रान्ति कोतवाल धनसिंह गुर्जर द्वारा शुरू हुई थी जिसको भारत का प्रथम स्वतंत्रता सग्राम, भारतीय विद्रोह , गुर्जर विद्रोह और सैनिक विद्रोह का नाम दिया गया और बाद में जन विद्रोह में परिवर्तित हो गयी थी। इसी प्रकार की एक घटना क्रम सन् 1824 में घटित हुई । कुछ इतिहासकारों ने इन घटनाओं के साम्य के आधार पर सन 1824 की क्रान्ति को सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम का अग्रगामी और पुर्वाभ्यास भी कहा है। सन् 1824 में सहारपुर-हरिद्वार क्षेत्र मे स्वतन्त्रता-संग्राम की ज्वाला उपरोक्त अन्य स्थानों की तुलना में अधिक तीव्र थी। आधुनिक हरिद्वार जनपद में रूडकी शहर के पूर्व में लंढौरा नाम का एक कस्बा है यह कस्बा सन् 1947 तक पंवार गुर्जर वंश के राजाओं की राजधानी रहा है। अपने चरमोत्कर्ष में लंढौरा रियासत में 804 गाँव थे और यहां के शासको का प्रभाव समूचे पश्चिम उत्तर प्रदेश में था। हरियाणा के करनाल क्षेत्र और गढ़वाल में भी इस वंश के शासकों का व्यापक प्रभाव था। सन् 1803 में अंग्रेजो ने ग्वालियर के सिन्धियाओं को परास्त कर समस्त उत्तर प्रदेश को उनसे युद्व हजीने के रूप में प्राप्त कर लिया। अब इस क्षेत्र में विधमान पंवार गुर्जर वंश की लंढौरा, नागर गुर्जर वंश की बहसूमा (मेरठ), भाटी गुर्जर वंश की दादरी (गौतम बुद्व नगर), जाटो की कुचेसर (गढ क्षेत्र) इत्यादि सभी ताकतवर रियासते अंग्रेजो की आँखों में कांटे की तरह चुभने लगी। सन् 1813 में लंढौरा के राजा रामदयाल सिंह गुर्जर की मृत्यू हो गयी। उनके उत्तराधिकारी के प्रश्न पर राज परिवार में गहरे मतभेद उत्पन्न हो गये। स्थिति का लाभ उठाते हुये अंग्रेजी सरकार ने रिायसत कोभिन्न दावेदारों में बांट दिया और रियासत के बडे हिस्से को अपने राज्य में मिला लिया
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3 अक्तूबर/बलिदान-दिवस
स्वाभिमानी राजा #विजय सिंह गुर्जर
सामान्यतः भारत में स्वाधीनता के संघर्ष को 1857 से प्रारम्भ माना जाता है; पर सत्य यह है कि जब से विदेशी और विधर्मियों के आक्रमण भारत पर होने लगे, तब से ही यह संघर्ष प्रारम्भ हो गया था। भारत के स्वाभिमानी वीरों ने मुगल, तुर्क, अरब, मंगोल पठान, बलोच और पुर्तगालियों से लेकर अंग्रेजों तक को धूल चटाई है। ऐसे ही एक वीर थे राजा विजय सिंह गुर्जर।
#उत्तराखंड राज्य में #हरिद्वार एक विश्वप्रसिद्ध तीर्थस्थल है। यहां पर ही गंगा पहाड़ों का आश्रय छोड़कर मैदानी क्षेत्र में प्रवेश करती है। इस जिले में एक गांव है #कुंजा बहादुरपुर। यहां के बहादुर राजा विजय सिंह ने 1857 से बहुत पहले 1824 में ही अंग्रेजों के विरुद्ध स्वाधीनता का संघर्ष छेड़ दिया था।
कंुजा बहादुरपुर उन दिनों #लंढौरा रियासत का एक भाग था। इसमें उस समय 44 गांव आते थे। 1913 में लंढौरा के राजा रामदयाल सिंह के देहांत के बाद रियासत की बागडोर उनके पुत्र राजा विजय सिंह ने संभाली। उन दिनों प्रायः सभी भारतीय राजा और जमींदार अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार कर रहे थे; पर गंगापुत्र राजा विजय सिंह किसी और ही मिट्टी के बने थे।
राजा विजय सिंह ने विदेशी और विधर्मी अंग्रेजों के आगे सिर झुकाने की बजाय उन्हें अपनी रियासत से बाहर निकल जाने का आदेश सुना दिया। वीर सेनापति #कल्याण सिंह भी राजा के दाहिने हाथ थे। 1822 ई0 में सेनापति के सुझाव पर राजा विजय सिंह ने अपनी जनता को आदेश दिया कि वे अंग्रेजों को मालगुजारी न दें, ब्रिटिश राज्य के प्रतीक सभी चिõों को हटा दें, तहसील के खजानों को अपने कब्जे में कर लें तथा जेल से सभी बन्दियों को छुड़ा लंे। जनता भी अपने राजा और सेनापति की ही तरह देशाभिमानी थी। उन्होंने इन आदेशों का पालन करते हुए अंग्रेजों की नींद हराम कर दी।
अंग्रेजों ने सोचा कि यदि ऐसे ही चलता रहा, तो सब ओर विद्रोह फैल जाएगा। अतः सबसे पहले उन्होंने राजा विजय सिंह को समझा बुझाकर उसके सम्मुख सन्धि का प्रस्ताव रखा; पर स्वाभिमानी राजा ने इसे ठुकरा दिया। अब दोनों ओर से लड़ाई की तैयारी होने लगी। सात सितम्बर, 1824 की रात को अंग्रेजों ने गांव कुंजा बहादुरपुर पर हमला बोल दिया। उनकी सेना में अनेक युद्ध लड़ चुकी गोरखा रेजिमेंट की नौवीं बटालियन भी शामिल थी
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क्रान्तिवीर झंडुसिंह नम्बरदार (1857 ई०) :
10 मई 1857 को मेरठ में क्रान्ति के विस्फोट के बाद मेरठ के आस-पास स्थित गुर्जरो के गांवों ने अंग्रेजी राज की धज्जिया उड़ा दी। अंग्रेजों ने सबसे पहले उन गांवों को सजा देने पर विचार किया जिन्होंने 10 मई की रात को मेरठ में क्रान्ति में बढ़ चढ़कर भाग लिया था और उसके बाद मेरठ के बाहर जाने वाले आगरा, दिल्ली आदि मार्गो को पूरी तरह से रेाक दिया था। जिसकी वजह से मेरठ का सम्पर्क अन्य केन्द्रों से कट गया था। इस क्रम में सबसे पहले 24 मई को 'इख्तयारपुर' पर और उसके तुरन्त बाद 3 जून को 'लिसाड़ी' , 'नूर नगर' और 'गगोल गांव' पर अंग्रेजों ने हमला किया। ये तीनों गांव मेरठ के दक्षिण में स्थित 3 से 6 मील की दूरी पर स्थित थे। लिसारी और नूरनगर तो अब मेरठ महानगर का हिस्सा बन गए हैं। गगोल प्राचीन काल में श्रषि विष्वामित्र की तप स्थली रहा है और इसका पौराणिक महत्व है। नूरनगर, लिसाड़ी और गगोल के किसान उन क्रान्तिवीरों में से थे जो 10 मई 1857 की रात को घाट, पांचली, नंगला आदि के किसानों के साथ कोतवाल धनसिंह गुर्जर के बुलावे पर मेरठ पहुँचे थे। अंग्रेजी दस्तावेजों से यह साबित हो गया है कि धनसिंह कोतवाल के नेतृत्व में सदर कोतवाली की पुलिस और इन किसनों ने क्रान्तिकारी घटनाओं का अंजाम दिया था। इन किसानों ने कैण्ट और सदर में भारी तबाही मचाने के बाद रात 2 बजे मेरठ की नई जेल तोड़ कर 839 कैदियों को रिहा कर दिया। 10 मई 1857 को सैनिक विद्रोह के साथ-2 हुए इस आम जनता के विद्रोह से अंग्रेज ऐसे हतप्रभ रह गए कि उन्होंने अपने आप को मेरठ स्थित दमदमें में बन्द कर लिया। वह यह तक न जान सके विद्रोही सैनिक किस ओर गए हैं ? इस घटना के बाद नूरनगर, लिसाड़ी, और गगोल के क्रान्तिकारियों बुलन्दशहर आगरा रोड़ को रोक दिया और डाक व्यवस्था भंग कर दी। आगरा उस समय उत्तरपश्चिम प्रांत की राजधानी थी। अंग्रेज आगरा से सम्पर्क टूट जाने से बहुत परेषान हुए। गगोल आदि गाँवों के इन क्रान्तिकारियों का नेतृत्व गगोल के झण्डा सिंह गुर्जर उर्फ झण्डू दादा कर रहे थे। Remaining Part is in Comment Box
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कोतवाल धनसिहँ गुर्जर (चपराणा) - 1857 क्रान्ति के जनक व प्रथम क्रान्तिकारी
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"कौम मेरी मरती रही मुल्क के दुश्मनो से लड़ लड़, इधर चापलूस अमीर बन गये
गुर्जर बन गए खानाबदोश और गद्दार-ए-वतन यंहा वजीर बन गए।

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1857 के गदर मे गुडगांव क्षैत्र के शहीद क्रान्तिवीर जिनको महरौली मे फाँसी दी गयी थी ।
पूरे देश को इन वीरो को भूलादेना, भारतीय इतिहास लेखन मे हुए जातिय-भेदभाव को दर्शाता है । अगर करते हो सम्मान देश के इन क्रान्तिवीरो का तो शेयर जरूर करे ।
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