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10 मई क्रांति दिवस विशेष
मेरठ से शुरू हुई सन सत्तावन की क्रांति के जनक शेर ए ग़दर कोतवाल धन सिंह गुर्जर जी को पूरा भारत जाने इसके लिए जरुरी है की इस बार की दस मई यानि क्रांति दिवस को क्रान्तिनायक धन सिंह गुर्जर को यद् किया जाये।उस दिन सबकी प्रोफाइल पिक पर "कोतवाल धन सिंह गुर्जर" की पिक लगाई जाए। साथ ही हमें अपने शहरों में कोतवाल जी की प्रतिमा या केवल चौक चौराहे का नाम भी करना होगा।पार्क का नाम करना होगा।अब आँख मूँदकर अपने शहीदों की अनदेखी नही सह सकते।ये लड़ाई हमारे बलिदान की है, हमारी पहचान की है। ज्यादा से ज्यादा शेयर करें।
जय कोतवाल,जय हिंद।
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#Must_Read दिल्ली के वीर शहीदो को नमन 🙏🏽
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दयाराम गुर्जर चन्द्रावल गांव का रहने वाला था। चन्द्रावल गांव दिल्ली शहर के बिल्कुल समीप है जो कमलानगर से मिला हुआ है। 1857 ई0 क्रान्ति मे दिल्ली के आसपास के गुर्जर अपनी ऐतिहासिक परम्परा के अनुसार विदेशी हकूमत से टकराने के लिये उतावले हो गये थे । दिल्ली के चारों ओर बसे हुए तंवर, चपराने, कसाने, बैंसले, विधुड़ी, अवाने खारी, बासटटे, लोहमोड़, बैसाख तथा डेढ़िये वंशों के गुर्जर संगठित होकर अंग्रेंजी हकूमत को भारत से खदेड़ा और दिल्ली के मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर को पुनः भारत का सम्राट बनाने के लिए प्राणपण से जुट गये थे । गुर्जरों ने शेरशाहपुरी मार्ग मथुरा रोड़ यमुना नदी के दोनों किनारों के साथ-2 अधिकार करके अंग्रेंजी सरकार के डाक, तार तथा संचार साधन काट कर कुछ समय के लिए दिल्ली अंग्रेंजी राज समाप्त कर दिया था। दिल्ली के गुर्जरों ने मालगुजारी बहादुरशाह जफर मुगल बादशाह को देनी शुरू कर दी थी ।
दयाराम गुर्जर के नेतृत्व में गुर्जरों ने दिल्लीी के मेटकाफ हाउस को कब्जे में ले लिया । जो अंग्रेंजों का निवास स्थान था, यहंा पर सैनिक व सिविलियम उच्च अधिकारी अपने परिवारों सहित रहा करते थे । जैसे ही क्रान्ति की लहर मेरठ से दिल्ली पहुंची, दिल्ली के गुर्जरों में भी वह जंगल की आग की तरफ फैल गई । दिल्ली के मेटकाफ हाउस में जो अंग्रेंज बच्चे और महिलायें उनको जीवनदान देकर गुर्जरों ने अपनी उच्च परम्परा का परिचय दिया था। महिलाओं और बच्चों को मारना पाप समझ कर उन्होने जीवित छोड़ दिया था और मेटकाफ हाउस पर अधिकार कर लिया ।दयाराम गुर्जर के नेतृत्व में दिल्ली के समीप वजीराबाद जो अंग्रेंजों का गोला बारूद का जखीरा था उस पर अधिकार करके बहादुरशाह जफर के हवाले कर दिया जिसमें एक लाख रू0 की बन्दूके थी। इसी तरह अंग्रेंजी सेना की 16 गाड़ियां 7 जून 1857 को रास्ते में जाती हुई रोक कर उनको अपने कब्जे में लेकर मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर को लाल किले में जा कर भेंट कर दी थी
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#10_May_Kranti_Divas
मेरठ के क्रान्तिकारियों का सरताज राव कदम सिंह नागर
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1857 ई0 के स्वतंत्रता संग्राम मे राव कदम सिंह मेरठ के पूर्वी क्षेत्र में क्रान्तिकारियों का नेता था। उसके साथ 10,000 हजार क्रान्तिकारी थे, जो कि प्रमुख रूप से मवाना, हिस्तानपुर और बहसूमा क्षेत्र के थे। ये क्रान्तिकारी कफन के प्रतीक के तौर पर सिर पर सफेद पगड़ी बांध कर चलते थे। मेरठ के तत्कालीन कलक्टर आर0 एच0 डनलप द्वारा मेजर जनरल हैविट को 28 जून 1857 को लिखे पत्र से पता चलता है कि क्रान्तिकारियों ने पूरे जिले में खुलकर विद्रोह कर दिया और परीक्षतगढ़ के राव कदम सिंह को पूर्वी परगने का राजा घोषित कर दिया। राव कदम सिंह और दलेल सिंह के नेतृत्व में क्रान्तिकारियों ने परीक्षतगढ़ की पुलिस पर हमला बोल दिया और उसे मेरठ तक खदेड दिया। उसके बाद, अंग्रेजो से सम्भावित युद्व की तैयारी में परीक्षतगढ़ के किले पर तीन तोपे चढ़ा दी। ये तोपे तब से किले में ही दबी पडी थी जब सन् 1803 में अंग्रेजो ने दोआब में अपनी सत्ता जमाई थी। इसके बाद हिम्मतपुर ओर बुकलाना के क्रान्तिकारियों ने राव कदम सिंह के नेतृत्व में गठित क्रान्तिकारी सरकार की स्थापना के लिए अंग्रेज परस्त गाॅवों पर हमला बोल दिया और बहुत से गद्दारों को मौत के घाट उतार दिया। क्रान्तिकारियों ने इन गांव से जबरन लगान वसूला। राव कदम सिंह बहसूमा परीक्षतगढ़ रियासत के अंतिम राजा नैन सिंह के भाई का पौत्र था। राजा नैन सिंह के समय रियासत में 349 गांव थे और इसका क्षेत्रफल लगभग 800 वर्ग मील था। 1818 में नैन सिंह के मृत्यू के बाद अंग्रेजो ने रियासत पर कब्जा कर लिया था। इस क्षेत्र के लोग पुनः अपना राज चाहते थे, इसलिए क्रान्तिकारियों ने कदम सिंह को अपना राजा घोषित कर दिया। 10 मई 1857 को मेरठ में हुए गुर्जर विद्रोह की खबर फैलते ही मेरठ के पूर्वी क्षेत्र में क्रान्तिकारियों ने राव कदम सिंह के निर्देश पर सभी सड़के रोक दी और अंग्रेजों के यातायात और संचार को ठप कर दिया। मार्ग से निकलने वाले सभी यूरोपियनो  को लूट लिया। मवाना-हस्तिनापुर के क्रान्तिकारियों ने राव कदम सिंह के भाई दलेल सिंह,
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वीरांगना आशादेवी गुर्जराणी -1857 विद्रोह की महानायिका
भारत माँ को अपने सपूतों पर गर्व हैं, जिन्होंने उनकी मर्यादा की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व लूटा दिया। इतिहास में ऐसे कई लाल हुए हैं, जिन्होंने अपनी जान से भी अधिक महत्व इस देश की आजादी को दिया। यही कारण है कि कृतज्ञ भारत उन्हें हमेशा याद रखता आया है और आगे भी रखेगा।भारतीयों ने ब्रितानियों की दासता से मुक्ति प्राप्त करने हेतु सर्वप्रथम प्रयास 1857 ईं. में किया था, जिसे प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नाम से भी जाना जाता है। इस गदर की शुरूआत मेरठ से दस मई 1857 को कोतवाल धनसिहँ गुर्जर ने की । अँग्रेज़ी सत्ता को नष्ट करने का पहला समूल प्रयास 1857 ई. में ही हुआ था, जिसमें न केवल क्रांतिकारियों ने अपितु भारतीय जनता ने भी खुलकर भाग लिया था। अँग्रेज़ और कुछ भारतीय चाटुकार इतिहासकार भले ही अपनी संतुष्टि के लिए सिपाही विद्रोह मानते हों, परंतु वास्तव में यह जन मानस का विद्रोह था। इसमें असंख्य लोग मारे गए। कुछ को भयंकर यातनाएँ दी गई, कुछ को ज़िंदा अग्नि देव का भेंट चढ़ा दिया गया, परंतु भारत भूमि इससे विचलित नहीं हुई।

जिन महानतम विभूतियों ने जीवन पर्यंत याद किया जाता है उनमें से एक थी मुजफ्फरनगर की कल्श्सान कुल की वीरांगना आशादेवी गुर्जराणी है।पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फनगर( अब शामली जिला ) के कल्श्सान खाप की वीर युवती ( जन्म - 1829 ) का मानना था कि आजादी की लडाई मे सिर्फ सैनिको का लडना ही काफी नही है बल्कि समाज के हर तबके के लोगो को कंधे से कंधा मिलाकर जंगे आजादी मे शामिल होना चाहिए । इस क्रान्तिकारी सोच के तहत गुर्जरो के गाव की इस साधारण सी गुर्जर महिला ने महिलाओ को सगठित कर अपनी सैना बना ली ।
1857 के संग्राम मे उस वीरांगना युवती ने अग्रेजो को काफी मश्किलो मे डाला ओर आस - पास के क्षेत्रो मे अपना दबदबा कायम करलिया ।
आशादेवी गुर्जराणी के संगठन की ताकत का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता हे कि सगठन की 250 महिला सैनिको की शहादत के बाद ही अग्रेज सेना आशादैवी को युद्धभूमि मे जिन्दा पकड सकी थी । ग्यारह अन्य महिला सैनिको के साथ बर्बर अग्रेजो ने आशादेवी को फासी पर लटका दिया । अपनी बहादुरी से सोये हुए भारत मे शोर्य ओर पराक्रम का आशादेवी गुर्जराणी ने एक बार फिर नया सचांर किया ।
सन्दर्भ :--
सुरेश नीरव, कादम्बिनी :
अगस्त - 2006 पृष्ट - 82

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तलवार और भालों से किया था गुर्जरों ने बंदूकों का सामना – 1824 का विशाल गुर्जर आंदोलन
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Refrence link:- https://www.youngisthan.in/hindi/gurjar-andolan-1824-42900/
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गुर्जर आंदोलन – भारत जब गुलाम था तब देश के अलग-लग जगहों पर देश को स्वतंत्र कराने के लिए आन्दोलनों का दौर चल रहा था

दश के इतिहास में बड़े-बड़े आन्दोलन हुए लेकिन आज इतिहास की किताबों में वहीँआन्दोलन दर्ज हैं जिनके अंदर बड़े नेता या देश का खास एक परिवार शामिल था. बहुत ही कम इतिहास की किताबें ऐसी हैं जहाँ 1857 से पहले के आन्दोलनों का जिक्र किया गया है. जब हम आन्दोलनों को पढ़ना शुरू करते हैं तो हम राष्ट्रीय स्तर के आंदोलन तो पढ़ लेते हैं किन्तु क्षेत्रीय स्तर के आंदोलनों को पढ़ना भूल जाते हैं और यही हमारी सबसे बड़ी गलती होती है. असल में अंग्रेजों की हुकूमत को राष्ट्रिय आन्दोलनों ने नहीं बल्कि क्षेत्रीय आन्दोलनों ने खोखला किया था.सन 1824 में देश के एक हिस्से में गुर्जर आंदोलन हुआ था और इस आंदोलन ने कुछ वैसा ही प्रभाव कायम किया था जैसा कि 1857 की क्रांति से उत्पन्न हुआ था. इन दोनों आन्दोलनों में बसफर्क इतना था एक आन्दोलन देश व्यापी हो गया था और एक आंदोलन निश्चित क्षेत्र तक फ़ैल कर थम गया था
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गुर्जर आंदोलन –

गुर्जर आंदोलन का सच्चा इतिहास

सबसे पहले यह जानना बेहद जरुरी है कि अंग्रेजों के खिलाफ 1757 से ही अलग-अलग जगहों पर विद्रोह चल रहे थे. भारतीय समाज ने शुरुआत से ही अंग्रेजों का विरोध किया था. सन 1824 मेंसहारनपुर, हरिद्वार और मेरठ में अंग्रेजों एक खिलाफ जबरदस्त विद्रोह चल रहे थे. अंग्रेजों ने इन आन्दोलनों को रोकने के लिए यहाँ छावनी तक बना रखी थी. सहारनपुर और हरिद्वार क्षेत्र में कुछ कस्बे ऐसे थे जहाँ गुर्जर वंश का साम्राज्य कायम था. हरिद्वार के पास आज जो रूडकी शहर है वहां पहले लंढौरा नाम का एक कस्बा काफी मशहूर था और यहाँ तब 804 गाँव थे. तब उस समय यहाँ लंढौरा, नागर, भाटी, जाटो की कुचेसर आदि जातियां राज कर रही थीं. अंग्रेज भली-भांति जानते थे कि यह जातियां कभी भी हमारे लिए खतरा बन सकती हैं. यही कारण था कि अंग्रेज इन लोगों कोकिसी भी हालत में खत्म कर देना चाहते थे. यह बात कुछ उस समय की है जब अंग्रेजों को बर्मा के हाथों
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#10MayKrantiDivas

रूडकी में सुनहरा गांव का बरगद शहीद स्मारक
यह सैकडो साल पुराना बरगद अंग्रेजो के जुल्म का खामोश गवाह है जहाँ अंग्रेजो ने कुंजा बहादुरपुर के विद्रोह 1824 में करीब डेढ सौ लोगो को पकडकर इस बरगद पर फांसी पर लटकाया था जिनमें कुंजा व रामपुर आदि गांव के लोग थे।
यहां से शुरू हुई थी आज़ादी की पहली क्रांति, वटवृक्ष पर क्रांतिकारियों को जिंदा लटकाया था।
बहुत कम लोगों को ये ज्ञान होगा कि देश की आज़ादी का सबसे पहला बिगुल रुड़की के एक गांव से बजा था। इस गांव का नाम है सुनहरा गांव। इसी गांव के वटवृक्ष पर 10 मई, 1857 को आज़ादी की पहली क्रांति का शुभारम्भ किया गया था। इस वटवृक्ष पर अंग्रेजों ने 150 से भी अधिक क्रांतिकारियों को जिंदा लटका दिया था तभी से इस स्थान को शहीद स्मारक नाम दिया गया।
10 मई, 1857 को आज़ादी की पहली क्रांति का हुआ था शुभारम्भ। तब भी यहाँ बहुत से क्रान्तिकारीयो को फांसी दी गयी। क्रांतिकारियों को दी जाती है श्रद्धांजली
इसलिए आज के दिन ( 10 मई क्रान्ति दिवस) हर वर्ष यहां सभी क्रांतिकारियों को श्रद्धांजली देने के लिए कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। अक्टूबर 1824 को हुआ था पहला युद्ध
गौर हो कि 10 मई, 1857 की क्रांति से कई वर्ष पहले 1824 को ही रुड़की में आजादी की क्रांति ज्वाला भड़क उठी थी। अक्टूबर 1824 को कुंजा ताल्लुका के राजा विजय सिंह गुर्जर व सेनापति कल्याण सिहँ के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ पहला युद्ध हुआ था। इसमें बड़ी संख्या में लोग शहीद हुए, कुछ पकड़े गए। इन लोगों को सुनहरा स्थित इस एतिहासिक वट वृक्ष पर फांसी दे दी गई थी। 3 अक्टूबर को हर साल राजा विजय सिहँ कुंजा शहीद दिवस मनाया जाता है। सैकड़ों ग्रामीणों को सरेआम दे दी गई थी फांसी
1857 की क्रांति के समय सहारनपुर से ज्वाइंट मजिस्ट्रेट सर राबर्टसन ने रामपुर, कुंजा आदि गांवों के लोगों को सरेआम इस पेड़ पर फांसी दे दी। उन्होंने यह कदम इसलिए उठाया कि लोग भयभीत हो जाए और अंग्रेजों के खिलाफ आवाज न उठा सके। देश आजाद होने तक पेड़ पर लटकी थीं जंजीरें
साल 1910 में शहर के एक लाला ललिता प्रसाद ने इस भूमि को खरीदा। ये गांव बाद में सुनहरा के नाम से जाना गया।
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#10MayKrantiDivas

कोतवाल धन सिहँ गुर्जर पर अंग्रेजी सरकार ने विद्रोही का तमगा लगाकर मेरठ में फाँसी पर चढा दिया व चार जुलाई को उनका गांव पाँचली तोप के हवाले कर दिया। आधा गांव जमींदोज हो गया। जो बचे उन्हें मौत के घाट उतार दिया। दस साल की उम्र से कम वाले लडको को छोडकर सबको अंग्रेजो ने मार दिया। आज ना किसी को कोतवाल की याद है ना ही उनके परिवार के पास कोई ऐसा राजनैतिक सुख जैसा कि अमूमन ज्यादातर सेनानियो के परिवार वालो ने उठाया । अब अगर कोतवाल धन सिहँ गुर्जर जी की याद में कुछ ना किया गया तो कोतवाल सदा के लिये गुमनामी की गलियो में दफन हो जायेंगे । जरूरी है कि आज इन्हें हर शहर व राज्य में पहचान दिलायी जाये
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10 मई 1857 को मेरठ में क्रान्ति के विस्फोट के बाद मेरठ के आस-पास स्थित गुर्जरो के गांवों ने अंग्रेजी राज की धज्जिया उड़ा दी। अंग्रेजों ने सबसे पहले उन गांवों को सजा देने पर विचार किया जिन्होंने 10 मई की रात को मेरठ में क्रान्ति में बढ़ चढ़कर भाग लिया था और उसके बाद मेरठ के बाहर जाने वाले आगरा, दिल्ली आदि मार्गो को पूरी तरह से रेाक दिया था। जिसकी वजह से मेरठ का सम्पर्क अन्य केन्द्रों से कट गया था। इस क्रम में सबसे पहले 24 मई को 'इख्तयारपुर' पर और उसके तुरन्त बाद 3 जून को 'लिसाड़ी' , 'नूर नगर' और 'गगोल गांव' पर अंग्रेजों ने हमला किया। ये तीनों गांव मेरठ के दक्षिण में स्थित 3 से 6 मील की दूरी पर स्थित थे। लिसारी और नूरनगर तो अब मेरठ महानगर का हिस्सा बन गए हैं। गगोल प्राचीन काल में श्रषि विष्वामित्र की तप स्थली रहा है और इसका पौराणिक महत्व है। नूरनगर, लिसाड़ी और गगोल के किसान उन क्रान्तिवीरों में से थे जो 10 मई 1857 की रात को घाट, पांचली, नंगला आदि के किसानों के साथ कोतवाल धनसिंह गुर्जर के बुलावे पर मेरठ पहुँचे थे। अंग्रेजी दस्तावेजों से यह साबित हो गया है कि धनसिंह कोतवाल के नेतृत्व में सदर कोतवाली की पुलिस और इन किसनों ने क्रान्तिकारी घटनाओं का अंजाम दिया था। इन किसानों ने कैण्ट और सदर में भारी तबाही मचाने के बाद रात 2 बजे मेरठ की नई जेल तोड़ कर 839 कैदियों को रिहा कर दिया। 10 मई 1857 को सैनिक विद्रोह के साथ-साथ हुए इस आम जनता के विद्रोह से अंग्रेज ऐसे हतप्रभ रह गए कि उन्होंने अपने आप को मेरठ स्थित दमदमें में बन्द कर लिया। वह यह तक न जान सके विद्रोही सैनिक किस ओर गए हैं ?  इस घटना के बाद नूरनगर, लिसाड़ी, और गगोल के क्रान्तिकारियों बुलन्दशहर आगरा रोड़ को रोक दिया और डाक व्यवस्था भंग कर दी। आगरा उस समय उत्तरपश्चिम प्रांत की राजधानी थी। अंग्रेज आगरा से सम्पर्क टूट जाने से बहुत परेषान हुए। गगोल आदि गाँवों के इन क्रान्तिकारियों का नेतृत्व गगोल के झण्डा सिंह गुर्जर उर्फ झण्डू दादा कर रहे थे। उनके नेतृत्व में क्रान्तिकारियों ने बिजली बम्बे के पास अंग्रेज़ी सेना के एक कैम्प को ध्वस्त कर दिया था। आखिरकार 3 जून को अंग्रेजो ने नूरनगर लिसाड़ी और गगोल पर हमला बोला।अंग्रेजी सेना के पास काराबाइने थी और उसका नेतृत्व...
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आज के दिन 8 अप्रैल को ही 1857 क्रान्ति के अग्रदूत शहीद मंगल पांडेय जी को अंग्रेजों ने फांसी दे दी थी।मंगल पांडेय ने बैरकपुर छावनी में धर्मिक कारणों से बगावत की थी जिसके कारण उन्हें फांसी दी गयी थी।बाद में 10 मई को मेरठ से मेरठ के तत्कालीन कोतवाल धन सिंह गुर्जर ने सैनिकों व किसानों के साथ 1857 सत्तावन की क्रांति की।याद रहे मेरठ से क्रांति का आरंभ मंगल पांडे ने नहीँ बल्कि कोतवाल धन सिंह गुर्जर ने किया था।हमें दोनों महान क्रान्तिवीरों का सम्मान करना है। आज क्रांति के अग्रदूत शहीद मंगल पांडेय को सत सत नमन ।
,जय हिंद।।
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जय कोतवाल,जय हिंद।

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आज के दिन 8 अप्रैल को ही 1857 क्रान्ति के अग्रदूत शहीद मंगल पांडेय जी को अंग्रेजों ने फांसी दे दी थी।मंगल पांडेय ने बैरकपुर छावनी में धर्मिक कारणों से बगावत की थी जिसके कारण उन्हें फांसी दी गयी थी।बाद में 10 मई को मेरठ से मेरठ के तत्कालीन कोतवाल धन सिंह गुर्जर ने सैनिकों व किसानों के साथ 1857 सत्तावन की क्रांति की।याद रहे मेरठ से क्रांति का आरंभ मंगल पांडे ने नहीँ बल्कि कोतवाल धन सिंह गुर्जर ने किया था।हमें दोनों महान क्रान्तिवीरों का सम्मान करना है। आज क्रांति के अग्रदूत शहीद मंगल पांडेय को सत सत नमन ।
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#Delhi के गुर्जरो का 1857 मे विद्रोह :
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1857 ई0 क्रान्ति में दिल्ली के आसपास के
गुर्जर अपनी ऐतिहासिक परम्परा के अनुसार विदेशी हकूमत से टकराने के लिये उतावले हो गये थे । दिल्ली के चारों ओर बसे हुए तंवर, चपराने, कसाने, भाटी, विधुड़ी, अवाने, बैसले, खारी, बासटटे, लोहमोड़, बैसौये ,डेढ़िये, आदि वंशो के गुर्जर संगठित होकर अंग्रेंजी हकूमत को भारत से खदेड़ा । गुर्जरों ने शेरशाहपुरी मार्ग मथुरा रोड़ यमुना नदी के दोनों किनारों के साथ-2अधिकार करके अंग्रेंजी सरकार के डाक, तार तथा संचार साधन काट कर कुछ समय के लिए दिल्ली अंग्रेंजी राज समाप्त कर दिया था। ।दयाराम गुर्जर के नेतृत्व में गुर्जरों ने दिल्ली के मेटकाफ हाउस को कब्जे में ले लिया । जो अंग्रेंजों का निवासस्थान था, यहा पर सैनिक व सिविलियम उच्च अधिकारीअपने परिवारों सहित रहा करते थे । जैसे ही क्रान्ति कीलहर मेरठ से दिल्ली पहुंची, दिल्ली के गुर्जरों में भी वह जंगलकी आग की तरफ फैल गई । दिल्ली के मेटकाफ हाउस में जोअंग्रेंज बच्चे और महिलायें उनको जीवनदान देकर गुर्जरों ने अपनी उच्च परम्परा का परिचय दिया था। महिलाओं और बच्चों को मारना पाप समझ कर उन्होने जीवित छोड़ दिया था और मेटकाफ हाउस पर अधिकार कर लिया ।दयाराम गुर्जर के नेतृत्व में दिल्ली के समीप वजीराबाद जो अंग्रेंजों का गोला बारूद का जखीरा था उस पर अधिकार कर लिया जिसमें लाखो रू की बन्दूके थी। इसी तरह अंग्रेंजी सेना की 16 गाड़ियां 7 जून 1857 को रास्ते में जाती हुई रोक कर उनको अपने कब्जे में लेकर गाडियो मे आग लगा दी । सर विलियम म्योर के इन्टेलिजेन्स रिकार्ड के अनुसार, गुर्जरों ने अंग्रेंजों के अलावा उन लोगों को भी नुकसान पहुंचाया जो अंग्रेजों का साथ दे रहे थे । .
शेष अगली पोस्ट मे......
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गुर्जर सम्राट नागभट्ट ने अरबी आक्रमण से होने वाली उथल पुथल व अस्त व्यस्तता का अवसर उठाते हुए बहुत से राज्यो को अपने अधीन करके गुर्जर साम्राज्य की स्थापना की।
गुर्जर सम्राट नागभट्ट ने उज्जैन को नयी राजधानी बनाया। नागभट्ट ने भारतीय संस्कृति व सभ्यता के लिये जो किया वह अतुलनीय है। इसीलिये इन्हें राष्ट्रनायक की उपाधि से विभूषित किया जाता है। राष्ट्र रक्षक वीर गुर्जर यह कथन उन्हीं के कारण चरितार्थ हुआ। इसी समय गुर्जरो ने एक नये युद्धनृत्य की रचना की जिसे गुर्जर रणनृत्य कहा जाता है। गुर्जरो के संख्या बल में कम होने के कारण व शत्रुओ की विशाल सेना से भिडने से पूर्व यह नृत्य किया जाता था जिससे शत्रु को भ्रम होता था कि गुर्जर सेना बहुत अधिक है।
बाद में गुर्जर प्रतिहार वंश में कई बेहद प्रतापी व पराक्रमी शासक हुए जैसे कि गुर्जर सम्राट वत्सराज, गुर्जर सम्राट नागभट्ट द्वितीय, आदिवराह गुर्जर सम्राट मिहिरभोज महान, गुर्जर सम्राट महेन्द्रपाल, गुर्जर सम्राट महिपाल प्रथम आदि।
गुर्जर सम्राट नागभट्ट का नाम सदा भारतीय संस्कृति संरक्षण के लिये याद किया जाता रहा रहेगा।
वे भारतीय इतिहास के महान यौद्धा व शासक थे।
यह 730 ई० के काल की बात है।
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1. गुर्जरो ने केवल ब्रिटिशर्स को ही तंग नही किया बल्कि पहले के हुक्मरानो को भी तंग करते रहते थे Ref Denzil Ibbetson Castes of Punjab 2. ये गुर्जर थे जो बाकी सबसे बुरी तरीके से हमारे साथ पेशाए। Ref Marting Indian Empire 3. बरेली मे बगावत की शूरूआत गुर्जरो ने की और उनके साथ बिजनौर और मुरादाबाद के जाट भी आ मिले। Ref Freedom Strugle in Uttar Pradesh 4. खबर आई है कि आस-पास के गुर्जरो ने जथे बनालिये है और लूट-मार मे मशरूफ है। Ref The Matcalf गद्दारो की सुबह-ओ-शाम 5. 29 जुलाई को जब गलोटी मे वलदीद खाँ पर हमला हुआ तो 400 घुडसवार और 600 पैदल फौज के पीछे 1000 गुर्जर उनकी पीठ पर थे Ref Memories of District Bulandshehr . #firstindependencewar #KotwalDhanSinghGurjar #freedomfighter #freedom #fighter #revolution #revolt #war #warriors #gujjar #gurjars #gujjar #gurjar #1857 #british #mangal #pandey #laxmibai #rebellion #meerut #dhansinghkotwal #mutiny #mutineers #army #history #gurjar #historyofindia #battle #veergurjar #sacrifice #meerut #freedom #gujjar #laxmibai #battle #rebellion #1857 #war #british #gurjars #mutineers #firstindependencewar #mangal #revolt #veergurjar #historyofindia #revolution #pandey #kotwaldhansinghgurjar #dhansinghkotwal #gurjar #sacrifice #army #fighter #freedomfighter #history #warriors #mutiny

1. गुर्जरो ने केवल ब्रिटिशर्स को ही तंग नही किया
बल्कि पहले के हुक्मरानो को भी तंग करते रहते थे
Ref: Denzil Ibbetson, Castes of Punjab

2. ये गुर्जर थे जो बाकी सबसे बुरी तरीके से हमारे साथ पेशाए।
Ref: Marting, Indian Empire

3. बरेली मे बगावत की शूरूआत गुर्जरो ने की और उनके
साथ बिजनौर और मुरादाबाद के जाट भी आ मिले। Ref: Freedom Strugle in Uttar Pradesh

4. खबर आई है कि आस-पास के गुर्जरो ने जथे बनालिये
है और लूट-मार मे मशरूफ है।
Ref: The Matcalf ; गद्दारो की सुबह-ओ-शाम

5. 29 जुलाई को जब गलोटी मे वलदीद खाँ पर हमला हुआ तो 400 घुडसवार और 600 पैदल फौज के पीछे 1000 गुर्जर उनकी पीठ पर थे
Ref: Memories of District Bulandshehr
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रूडकी में सुनहरा गांव का बरगद शहीद स्मारक
यह सैकडो साल पुराना बरगद अंग्रेजो के जुल्म का खामोश गवाह है जहाँ अंग्रेजो ने कुंजा बहादुरपुर के विद्रोह 1824 में करीब डेढ सौ लोगो को पकडकर इस बरगद पर फांसी पर लटकाया था जिनमें कुंजा व रामपुर आदि गांव के लोग थे।
यहां से शुरू हुई थी आज़ादी की पहली क्रांति, वटवृक्ष पर क्रांतिकारियों को जिंदा लटकाया था।
बहुत कम लोगों को ये ज्ञान होगा कि देश की आज़ादी का सबसे पहला बिगुल रुड़की के एक गांव से बजा था। इस गांव का नाम है सुनहरा गांव। इसी गांव के वटवृक्ष पर 10 मई, 1857 को आज़ादी की पहली क्रांति का शुभारम्भ किया गया था। इस वटवृक्ष पर अंग्रेजों ने 150 से भी अधिक क्रांतिकारियों को जिंदा लटका दिया था तभी से इस स्थान को शहीद स्मारक नाम दिया गया।
10 मई, 1857 को आज़ादी की पहली क्रांति का हुआ था शुभारम्भ। तब भी यहाँ बहुत से क्रान्तिकारीयो को फांसी दी गयी। क्रांतिकारियों को दी जाती है श्रद्धांजली
इसलिए आज के दिन ( 10 मई क्रान्ति दिवस) हर वर्ष यहां सभी क्रांतिकारियों को श्रद्धांजली देने के लिए कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। अक्टूबर 1824 को हुआ था पहला युद्ध
गौर हो कि 10 मई, 1857 की क्रांति से कई वर्ष पहले 1824 को ही रुड़की में आजादी की क्रांति ज्वाला भड़क उठी थी। अक्टूबर 1824 को कुंजा ताल्लुका के राजा विजय सिंह गुर्जर व सेनापति कल्याण सिहँ के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ पहला युद्ध हुआ था। इसमें बड़ी संख्या में लोग शहीद हुए, कुछ पकड़े गए। इन लोगों को सुनहरा स्थित इस एतिहासिक वट वृक्ष पर फांसी दे दी गई थी। 3 अक्टूबर को हर साल राजा विजय सिहँ कुंजा शहीद दिवस मनाया जाता है। सैकड़ों ग्रामीणों को सरेआम दे दी गई थी फांसी
1857 की क्रांति के समय सहारनपुर से ज्वाइंट मजिस्ट्रेट सर राबर्टसन ने रामपुर, कुंजा आदि गांवों के लोगों को सरेआम इस पेड़ पर फांसी दे दी। उन्होंने यह कदम इसलिए उठाया कि लोग भयभीत हो जाए और अंग्रेजों के खिलाफ आवाज न उठा सके। देश आजाद होने तक पेड़ पर लटकी थीं जंजीरें
साल 1910 में शहर के एक लाला ललिता प्रसाद ने इस भूमि को खरीदा। ये गांव बाद में सुनहरा के नाम से जाना गया।
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आज तक हमारे नेताओ व विधायको ने एक ईमानदार पहल तक नहीं की है कोतवाल धन सिहँ गुर्जर के लिये,उन्होंने आज तक कभी भी उत्तर प्रदेश विधानसभा में यह मुददा नहीं उठाया कि मेरठ की क्रान्ति के नायक के रूप में व शहीद के रूप में कोतवाल धन सिहँ गुर्जर को मान्यता दी जाये।उन्हें शहीद का अधिकारिक दर्जा दिया जाये व मेरठ के शहीद स्मारक में उनका प्रतिमा लगायी जाये। कभी इनमें से किसी ने भी विधानसभा में खडे होकर यह नहीं कहा कि यह केवल एक भ्रम है , भ्रान्ति है कि मेरठ की क्रान्ति का संबन्ध मंगल पांडे से है जबकि सच्चाई ये है कि मेरठ की क्रान्ति का दारोमदार केवल कोतवाल धन सिहँ पर है ।
ये विधायक आज तक अपने मुहँ से यह मांग नहीं कर सके कि कोतवाल धन सिहँ गुर्जर को शहीद का दर्जा देकर गांव पांचली में उनका एक स्मारक बनाया जाये ताकि उनके व उनके गांव के बलिदान को याद किया जा सको। एक भी ढंग की या ईमानदार कोशिश की ही नहीं गयी। समझ नहीं आता कि ये विधायक बनते किस लिये हैं क्या केवल मजे मारने के लिये ।क्या केवल सफेद कुर्ता पहनकर शादी ब्याहो में जाने को लिये । विधानसभाओ में प्रशनकाल होते हैं,क्या आज तक बिरादरी को किसी विधायक ने कोई प्रश्न किया या सब मुहँ में दही जमाकर बैठ जाते हैं । अरे अगर नहीं बोलना आता तो क्यों राजनीति में उतरते हो ,अपने घर बैठो , जिस युवा को बोलना आता है उसे मौका दो ताकि हमारी मांगो को ,हमारी उम्मीदो को आवाज तो मिलेगी । कम से कम अब तो इन एहसानफरामोश विधायको को आवाज उठानी चाहिये । अब तो मुख्यमन्त्री से कहकर कुछ करना चाहिये । अब कोरे आश्वासन से काम नहीं चलेगा बल्कि कुछ ठोस होना चाहिये । सरकार से मांग करके ,विधानसभाओ में मांग करके कोतवाल धन सिहँ जी ,राव कदम सिहँ गुर्जर व राव उमराव सिहँ भाटी के बलिदान को उत्तर प्रदेश के पाठ्यक्रमो में जगह दिलानी चाहिये । मेरठ की क्रान्ति का जब जिक्र हो कि मेरठ की गदर को नायक कौन ? तो नाम कोतवाल धन सिहँ गुर्जर का आना चाहिये ।
मेरठ के एकमात्र गुर्जर विधायक डाँ सोमेन्द्र तोमर को यूपी विधानसभा में मांग करनी चाहिये कि कोतवाल धन सिहँ गुर्जर को शहीद का दर्जा मिले व उनको पाठ्यक्रमो में शामिल किया जाये । उन्हें भारत के
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